"i सम्यक" बद्दल थोडक्यात

सम्यक समाजासाठी ६ बिंदूचा संस्कार - स्व अध्ययन - सामुहीकता - समत्व - सेवा - स्वातंत्र्य - संघर्ष.या ६ बिंदूचा संस्काराशी संबधित सर्व क्षेत्रां(अर्थशास्त्र, सेवाकार्य, विचार दर्शन, इतिहास व इतर) वर वाचन-लेखन -चर्चा-कार्यशाळा-सेवा-अनुभव या साठी "i सम्यक"
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COMPANY FORMATION से IPO तक का सफ़र - 6


TURNOVER क्या होता है?

TURNOVER Hindi Meaning,
Turn over का अलग अलग कॉन्टेक्स्ट में अलग अलग मीनिंग हो सकता है, जैसे –
Business के संदर्भ में Business Turnover का हिंदी अर्थ है – कुल विक्री (Net Sales),
HR मैनेजमेंट के सन्दर्भ में टर्नओवर का मतलब है – एक टाइम पीरियड में कितने employee ने जॉब छोड़ा और उनके बदले कितने employee को जॉब पे रखा गया,इसे employee turn over rate कहा जाता है,
अगर stock market turnover तथा फाइनेंस के सन्दर्भ में बात करे तो टर्नओवर का अर्थ है –
  • प्राइस के सन्दर्भ में – किसी टाइम पीरियड में ट्रेडेड शेयर के कुल प्राइस वैल्यू
  • वॉल्यूम के सन्दर्भ में – किसी टाइम पीरियड में ट्रेडेड शेयर के कुल quantity या volume

आम तौर पे जब फाइनेंस के क्षेत्र में टर्नओवर शब्द का इस्तेमाल किसी कम्पनी द्वारा किसी टाइम पीरियड में किये जा रहे कुल बिज़नस, सेल्स,और कारोबार की संख्या और मूल्य को दिखाने के लिए किया जाता है,

TURNOVER – EXAMPLE  

TURNOVER एक फाइनेंसियल टर्म है जो हमें अक्सर अख़बार, इन्टरनेट, या टीवी पर किसी कंपनी, और उसके द्वारा किये जाने वाले व्यापर के समबन्ध में “TURNOVER”  शब्द के बारे में सुनने को मिलता है, जैसे – XYZ कंपनी का इस साल टर्नओवर 10 करोड़ से ऊपर रहा, ABC कंपनी के टर्नओवर इस साल 50 करोड़ से कम रहा, और ऐसे ही बहुत सारी हेडलाइंस देखने और सुनने को मिलता है,
हाल ही में जब भारत में GST लागु हुआ, उस समय GST की रेट के संबध में सरकार द्वारा भी व्यापारियों के TURNOVER के हिसाब से GST लगाया जायेगा , ऐसी खबरे आई थी,
GST: Composition scheme extended to Rs. 1 cr, quarterly returns for taxpayers with turnover of Rs 1.5 cr
तो यहाँ ध्यान देने वाली बात ये है कि “टर्नओवर” शब्द से हम किसी कंपनी के एक साल में कुल किये जाने वाले बिज़नस (कारोबार) यानी NET SALES के बारे में ही बात कर रहे होते है,

BUSINESS TURNOVER

हमने देखा Business Turn over एक ऐसा वैल्यू है, जो कि किसी बिज़नस के Total sales को बताता है, और आम तौर पे टर्नओवर किसी financial year में कंपनी द्वारा किये गए कुल sales का योग होता है,
बिज़नस टर्नओवर के द्वारा हम किसी बिज़नस की प्रोडक्ट को सेल करने की क्षमता और गुणवत्ता दोनों को समझ सकते है, टर्नओवर को  अलग अलग फाइनेंसियल शब्दों के साथ इस्तेमाल भी किया जाता है,
जैसे – Sales Turn over, Profit Turn over, Income Turn over, Inventory turn over, Employee Turn over, Volume Turn over, Price Turn over.

TURNOVER समझने का महत्व,

टर्नओवर से हमें बहुत आसानी से किसी कंपनी या संस्था द्वारा किसी टाइम पीरियड में किये जाने वाले कारोबार का पता चल जाता है, और हमें ये दो कंपनी के कारोबार में अंतर को समझने में आसानी होती है,
तुलनात्मक रुप से एक ही प्रोडक्ट या इंडस्ट्री में काम करने वाली दो कंपनी के टर्नओवर को देखकर आसानी से समझा जा सकता है, कौन सी सी कंपनी अच्छा काम कर रही है,
स्टॉक मार्केट इन्वेस्टमेंट में भी जब हम किसी कम्पनी के शेयर खरीदते है, सब कुछ इस बात पे निर्भर होता है, कि अगर हम जिस कंपनी का शेयर खरीद रहे है, वो अच्छा बिज़नस यानी जब उसका टर्नओवर अच्छा रहेगा, तभी वह अच्छा लाभ भी कमाएगी, और इसलिए हमें अलग अलग कंपनी के हर साल के टर्नओवर पर भी ध्यान देना चाहिए,
टर्नओवर और लाभ को एक साथ देखने से हमें ये भी पता चलता है कि टर्नओवर और लाभ के बीच कितना अच्छा सम्बन्ध है, या कितना ख़राब, क्योकि कभी कभी ऐसा भी हो सकता है कि किसी कंपनी का SALES, कारोबार यानी टर्नओवर बहुत अच्छा हो लेकिन उसका प्रॉफिट या लाभ उसके मुकाबले काफी कम हो,

TURNOVER कैलकुलेशन,

अगर बात करे टर्नओवर कैलकुलेशन की तो, टर्नओवर कैलकुलेट करने के तरीके,
  1. जितनी भी quantity एक निश्चित समय में सेल हुई है, उन सबका उसके प्राइस के साथ योग.
यानी Total sales की गयी quantity का उसके मूल्य के साथ योग.
TURN OVER = Total of Sales during a period
  1. एक दूसरा तरीका ये है, की आप sales की गई पूरी quantity को एक एवरेज प्राइस के साथ multiply कर दे,
TURN OVER =”Total quantity” sold in period x “Average Price” in that period

TURNOVER के सम्बन्ध में ध्यान देने वाली बाते

  1. TURN OVER का मतलब किसी निश्चित टाइम पीरियड का NET SALES होता है,
  2. टर्नओवर को Revenue और Total Business, या Total Business को नाम से भी जाना जाता है,
  3. Turnover या Revenue या Total Business कंपनी द्वारा की जाने वाली Business Activities यानी Goods और Services के Sales से प्राप्त होने वाला Amount होता है, और कुछ कंपनी का इंटरेस्ट, रोयल्टी, या अलग अलग फीस के रुप में Revenue प्राप्त होता है,
  4. आम तौर पर किसी बिज़नस के TURN OVER का टाइम पीरियड पुरे साल के NET SALES को दर्शाता है
  5. TURNOVER द्वारा कंपनी के द्वारा किये गए किसी टाइम पीरियड में TOTAL BUSINESS, को भी दिखया जाता है, जैसे – ABC LTD. कंपनी ने पुरे साल में कुल 1.5 करोड़ का प्रोडक्ट सेल किया, तो कहा जा सकता है,ABC LTD कंपनी का कुल टर्नओवर 1.5 करोड़ है, और साथ ये भी कहा जा सकता है कि ABC ने Total Business 1.5 करोड़ का था.
  6. किसी व्यापार का TURN OVER समय के साथ बदलता रहता है, यह कंपनी के प्रोडक्ट की मार्केट में Demand और supply के ऊपर निर्भर होता है,
  7. Business के Turn over को साल दर साल टर्नओवर के आधार पर तुलना करके समझा जा सकता है कि बिज़नस का ग्रोथ कैसे हो रहा है

COMPANY FORMATION से IPO तक का सफ़र-5


NET WORTH

हे दोस्तों, आज का टॉपिक है – NET WORTH क्या होता है? इस टॉपिक में NET WORTH के महत्त्व को समझेंगे और साथ ही साथ जानेगे कि NET WORTH कैसे CALCULATE किया जाता है?

NET WORTH क्या होता है?

NET WORTH का हिंदी अर्थ है – शुद्ध सम्पति,
NET WORTH एक फाइनेंसियल टर्म है, जो किसी व्यक्ति,कंपनी, संस्था, के पास शुद्ध सम्पति को बताता है,और साथ ही साथ NETWORTH के द्वारा हम उस व्यक्ति,कंपनी, संस्था के वास्तविक फाइनेंसियल हालत को समझ सकते है,
यहाँ शुद्ध सम्पति (NETWORTH) से हमारा मतलब ये है कि उस संस्था के पास जो भी सम्पति(TOTAL ASSET) है, उसमे से उसके सभी तरह के दायित्व (TOTAL LIABILITES) को घटाने के बाद जो कुछ भी सम्पति के रूप में बचे, वो उस संस्था का NETWORTH कहा जायेगा,
जैसे – हम अक्सर अख़बार, इन्टरनेट, या टीवी पर किसी कंपनी, क्रिकेटर,या फ़िल्म स्टार्स, या किसी अन्य सेलेब्रिटी के आर्थिक स्थिति (Financial Position) के सम्बन्ध में उसके “NETWORTH” के बारे में सुनने को मिलता है, हाल ही में विराट कोहली और अनुष्का शर्मा की शादी के समंध में उन दोनों के NETWORTH की खबरे VIRAL हुई थी,
विराट कोहली और अनुष्का शर्मा नेट वर्थ – 1000 करोड़ से ऊपर
तो यहाँ ध्यान देने वाली बात ये है कि NETWORTH द्वारा आसानी से किसी व्यक्ति,कंपनी, या संस्था के वित्तीय स्थिति के बारे में समझा जा सकता है, और विराट और अनुष्का शर्मा की फाइनेंसियल मजबूती को समझाने के लिए ही उनके NETWORTH के बारे में बात की जा रही है,
NETWORTH को समझना बहुत इम्पोर्टेन्ट हो जाता है, क्योकि NETWORTH ही किसी व्यक्ति,कंपनी, या संस्था के वास्तविक स्थिति को बताता है,
ऐसे में हो सकता है कि व्यक्ति,कंपनी, या संस्था के पास बहुत सारी सम्पति हो,
लेकिन साथ ही साथ उसके ऊपर बहुत सारे दायित्व भी हो,
तो इस तरह अगर आपको उसकी फाइनेंसियल स्थिति को समझना है, तो आप कैसे समझेंगे?,
फाइनेंसियल स्थिति को समझने के लिए आपको उसके सभी सम्पतियो के मूल्य से उसके सभी दायित्वों के मूल्य को कम करना होगा और जो बच जायेगा,
वो होगी उसकी वास्तविक फाइनेंसियल स्थिति , जिसे हम NET WORTH के नाम से भी जानते है,

आज अगर आपकी SALARY बहुत अच्छी है, और आप बिना अपने NET WORTH पर ध्यान देते हुए सिर्फ CURRENT INCOME के आधार पर आप एक बहुत महँगी कार या घर खरीद लेते है, क्योकि आपकी सैलरी के आधार पर बैंक आपको कार खरीदने के लिए LOAN आसानी से दे देती है ,फाइनेंसियल प्लानिंग, और फाइनेंस से जुड़े किसी तरह के फैसले से पहले, अगर आपको अपने “NETWORTH” के बारे में नहीं पता है, तो ऐसे में हो सकता है कि आप कुछ ऐसा निर्णय ले लेंगे, जिस से आपको फ्यूचर में काफी परेशानी का सामना करना पड़ जाये,
तो ध्यान देने वाली बात ये है कि, ऐसे में क्या होगा अगर किसी वजह से आपको जॉब छोड़ना पड़े, और आपकी सैलरी की INCOME बंद हो जाये,
ऐसे में अगर आपकी NET WORTH कार की कुल कीमत या घर की कीमत (लोन के व्याज सहित) और उस से अधिक नहीं है,तो आपको अपनी कार या घर से हाथ धोना पड़ सकता है,और आप को अपने कार लेने के निर्णय के बारे में पछताना भी पड़ सकता है,
अगर आपने कार लेते समय ही अपने NETWORTH CALCULATE कर लिया होता, तो शायद आज जॉब छूटने के बाद भी उस कार को अपने पास रख सकते थे,
इसलिए हम सभी को इस तरह की किसी भी फाइनेंसियल निर्णय लेने से पहले, अपना NET WORTH जरुर समझना चाहिए,जिस से हम बेहतर फाइनेंसियल डिसिशन ले सके,

NET WORTH की गणना कैसे की जाती है,

Net worth को कैलकुलेट करना बहुत आसान है, इसकी गणना बहुत ही आसान है,
आपको केवल अपने कुल सम्पतियो के योग से अपने कुल दायित्वों के योग को घटाना है,
NET WORTH = TOTAL ASSET – TOTAL LIABILITIES
लेकिन आपको अपने कुल सम्पतियो और कुल दायित्वों के योग के लिए थोड़ी मेहनत करनी पड़ सकती है,

STEP OF CALCULATING NET WORTH

1. MAKE LIST OF ALL ASSETS
सबसे पहले आपको अपने ASSET की पूरी LIST बनानी होगी,
ASSET में आपकी सभी तरह के CASH, BANK में जमा, निवेश की रकम, आपका घर, जमीन, प्लॉट्स, या जिसको भी आप सम्पति मानते है,
2.MAKE LIST OF ALL LIABILITIES
फिर आपको अपने सभी तरह के दायित्वों की लिस्ट बनानी होगी,
दायित्वों में आपके ऊपर सभी तरह के SHORT TERM और LONG TERM LOAN,चाहे वो HOME LOAN हो, कार लोन हो, मोबाइल, TV, फ्रीज या पर्सनल लोन हो,और किसी तरह का HAND LOAN, उधारी, को लिस्ट में शामिल करना होगा,
3.तीसरा स्टेप है- वैल्यूएशन (VALUATION)
अब आपको अपने लिस्ट किये गए सभी ASSET यानी सम्पति की आज की बाजार कीमत लगानी है, यानी उनका MARKET VALUE लिखना है,
और साथ ही साथ अपने सभी तरह LOAN और LIABILITES की भी अभी की current VALUE निकालनी होगी,जिसके लिए हो सकता है, आपने जहा से लोन लिया है,उनसे आउटस्टैंडिंग लोन का स्टेटमेंट मांगना पड़े,
4. Asset और liabilites का TOTAL करना
अब आप संपति और दायित्व को टोटल लगाना होगा, यानि सम्पति का कुल योग कितना हो रहा है, और दायित्वों का कुल योग क्या हो रहा है,
और दोनों का अलग अलग टोटल लिख ले,
5. FINAL STEP OF NET WORTH CALCULATION
अब आपको सिर्फ इतना सा करना है कि टोटल सम्पति से टोटल दायित्व को घटा देना है-
नेट वर्थ = कुल सम्पति – कुल दायित्व
और इस तरह आप कभी भी अपना NET WORTH CALCULATION कर सकते है,
और कुछ इसी प्रकार से कंपनी और संस्था भी अपना NET WORTH CALCULATE करती है,
स्टॉक मार्केट में LISTED कंपनी के NET WORTH को किसी भी तरह के निवेश से पहले समझना बहुत आवश्यक हो जाता है,
और इस तरह, NET WORTH CALCULATION करना FUNDAMENTAL ANALYSIS का एक महत्वपूर्ण पार्ट हो जाता है,

NET WORTH के सम्बन्ध में ध्यान देने वाली बाते

  1. NETWORTH बिलकुल आसान है, यह आपकी वो मूल्य (NET VALUE) है, जो आपकी कुल सम्पति में से आपके कुल दायित्वों को घटाने पर प्राप्त होता है,
  2. NET WORTH का एक और मतलब ये भी है, कि आपके कुल सम्पतियो को बेचने से मिलने वाली वैल्यू , में से आपके कुल दायित्वों को चुकाने के बाद, बचा हुआ पैसा या सम्पति,
  3. NET WORTH नेगेटिव मात्रा में भी हो सकता है, ऐसा तब होगा जब सम्पति से ज्यादा दायित्व हो,हालाँकि ये स्थिति बिल्कुल डरावनी है, लेकिन जाने या अनजाने में ज्यादातर लोग इस तरह की स्थिति में फंस जाते है,
  4. NET WORTH समय के साथ बदलता रहता है, यह व्यक्ति, संस्था या कंपनी के लाभ कमाने की क्षमता और उसके द्वारा लिए जाने LOAN और अन्य दायित्वों पर निर्भर होता है,
  5. आप अपनी फाइनेंसियल ग्रोथ को साल दर साल NET WORTH के आधार पर तुलना करके समझ सकते है, और आपको हमेशा अपने वास्तिवक आर्थिक स्थिति का अंदाजा रहेगा,
  6. सिर्फ NET WORTH के आधार पर आर्थिक निर्णय नहीं लिया जाना चाहिए,भविष्य की जिम्मेदारी को भी ध्यान में रखना होता है,
ध्यान देने वाली बात है कि नेट वर्थ में में FUTURE में आने वाले किसी भी बड़ी जिम्मेदारी को शामिल नहीं किया गया होता है, इसलिए हमें कोई फाइनेंसियल निर्णय सिर्फ NET WORTH के आधार पर नहीं लेना चाहिए,
हमें इस बात को ध्यान में रखना चाहिए फ्यूचर में अगर हमें कोई बड़े और आवश्यक खर्चे लगने वाले है, तो आज हमारी अच्छी NETWORTH होने के बाद भी कोई ऐसा फाइनेंसियल डिसिशन ना ले, जिस से हमारा फ्यूचर बहुत ज्यादा प्रभावित होने वाला हो,

COMPANY FORMATION से IPO तक का सफ़र-4

IPO PROCESS

दोस्तो, आज का हमारा Topic है, IPO PROCESS
IPO लाने का Process क्या है? एक कंपनी कैसे अपना IPO यानी पब्लिक इशू निकालती है?
IPO के लिए कंपनी को मुख्य रूप से कौन से नियम और शर्तो को पालन करना होता है ?
अगर आपके मन मे भी IPO PROCESS – Initial Public Offering से सम्बंधित कुछ इस तरह के सवाल है, तो आप इस ARTICLE को पूरा पढ़ते रहिये,
क्योंकि मैं आज आपसे इसी के बारे में बात करने वाला हु,

IPO PROCESS कैसे की जाती है,

जब कोई कंपनी अपने पूंजी की आवश्यकता को पूरा करने के लिए IPO लाने का निर्णय लेती है, तब उसे IPO लाने और स्टॉक मार्केट पे कंपनी को लिस्ट करने के SEBI द्वारा बनाये गए बहुत सारे नियम का पालन करना होता है-
जिसमे सबसे पहला काम होता है – एक मर्चेंट बनकर Appoint करना,
मर्चेंट बैंकर जिसे BRLM  (BOOK RUNNING LEAD MANAGERS) या LM (LEAD MANAGER) भी कहा जाता है,
आइये अब देखते है, मर्चेंट बैंकर या BRLM को प्रमुख रूप से कौन से काम करने होते है-

MERCHANT BANKER के काम,

  1. Merchant Bank इस बात को सुनिश्चित करते है कि IPO लाने वाली कंपनी ने सभी तरह के क़ानूनी नियमो का पालन किया है, और इसके लिए उस कंपनी को Diligence सर्टिफिकेट भी Issue करती है,
  2. मर्चेंट बैंक कंपनी को Draft Red Herring Prospectus (DRHP) बनाने और Listing Documents तैयार कराने में भी Help करता है,
  3. कंपनी के लिए REGISTRAR, BANKERS, आदि निश्चित करने में हेल्प करता है
  4. मर्चेंट बैंकर कंपनी के shares को Underwrite भी करता है, यानी मर्चेंट बैंक कंपनी के शेयर का पूरा हिस्सा या कुछ हिस्सा खरीदने के लिए तैयार होता है, जिसे वह Resell से पब्लिक को बेच सके.
  5. कंपनी के SHARE का IPO में PRICE RANGE/PRICE BAND यानी शेयर का न्यूनतम और अधिकतम मूल्य तय करने में HELP करती है,
  6. इसके साथ मर्चेंट बैंक कंपनी के IPO की मार्केटिंग, PROMOTION, और अन्य गतिविधियों से लोगो तक IPO के बारे में जानकारी पहुचाने में हेल्प करती है,

IPO की पूरी गतिविधि 

1. MERCHANT BANK को APPOINT करना,
2. SEBI के पास IPO के लिए रजिस्ट्रेशन कराना,
3. SEBI का APPROVAL प्राप्त करना,
4.Draft Red Herring Prospectus (DRHP) तैयार करना,
DHRP को हम PROSPECTUS के नाम से भी जानते है, ये IPO का सबसे महत्वपूर्ण DOCUMENT होता है , जिसमे निम्न बातो की पूरी जानकारी होती है-
  • IPO की पूरी जानकारी
  • PUBLIC को ऑफर किये जाने वाले पुरे शेयर की संख्या
  • कंपनी क्यों शेयर ISSUE करना चाहती है, कंपनी IPO से प्राप्त पैसे का क्या इस्तेमाल करने वाली है,
  • कंपनी का PROJECT PLAN
  • कंपनी के बिज़नस का RISK RATIO
  • कंपनी के पिछले फाइनेंसियल स्टेटमेंट
  • कंपनी मैनेजमेंट की जानकारी, उनकी पर्सनल जानकारी और बैकग्राउंड
  • IPO की मार्केटिंग- प्रिंट मीडिया, इन्टरनेट मार्केटिंग, TV मार्केटिंग और अन्य
5. OPEN IPO FOR PUBLIC – Date of Issue तय करना,
6.OPEN IPO FOR PUBLIC- इस PROCESS को  जिसे BOOK BUILDING PROCESS भी कहा जाता है, इस दौरान  कंपनी पब्लिक से आईपीओ के लिए APPLY करने का समय देती है, जो नॉर्मली 2 से 6 दिन तक हो सकता है,
7. आईपीओ का PRICE BAND – इस PROCESS में IPO में शेयर के भाव का एक RANGE तय किया जाता है-
जैसे – प्रति शेयर का  न्यूनतम और अधिकतम मूल्य तय करना,और इसी तय PRICE BAND में PUBLIC को IPO में शेयर दिए जाते है,
ध्यान देने वाली बात ये है कि-
PRICE BAND में PUBLIC को जो मूल्य ठीक लगता है, उस मूल्य और QUANTITY के लिए APPLICATION दे सकती है,
जैसे – अगर कंपनी ने प्राइस बंद 500 -550 तय किया  है तो ऐसे में, अधिकतम PRICE के ऑर्डर्स को पहले कम्पलीट किया जाता है, और PUBLIC के ऊपर छोड़ दिया जाता है कि उसे कंपनी द्वारा तय किये गए PRICE BAND में जो PRICE ठीक लगे, उस प्राइस के साथ APPLICATION कर सकती है,
मान लीजिए अगर  550 से 550 का PRICE BAND तय किया जाता है, तो कई लोग 500 रूपये पर शेयर प्राप्त करने का एप्लीकेशन देंगे, जबकि काफी लोग 505, 515, 525, 530, 535, 540, 545, 550  यानी 500 से 550 के बीच किसी भी मूल्य का APPLICATION पब्लिक द्वारा उस आईपीओ के लिए दिया जा सकता है,
8. CLOSURE – आईपीओ के APPLY करने का आखिरी दिन ख़तम होने के बाद से कंपनी को ये तय करना होता है, पब्लिक से प्राप्त आवेदन में किस एप्लीकेशन को एक्सेप्ट करे और कौन कौन से PRICE पर,
9. LISTING – सबसे अंत में LISTING का दिन आता है, जब कंपनी BOOK BUILDING PROCESS के द्वारा तय किये गए PRICE पर स्टॉक मार्केट में उस शेयर को लिस्ट कर दिया जाता है,

IPO PROCESS- SUMMARY

अगर हम अपनी बात को SUMMARIZE करे तो, IPO Process, वह PROCESS है, जिसके द्वारा कंपनी अपना आईपीओ लाती है,
और आईपीओ के बाद कंपनी का स्टॉक सेकेंडरी मार्केट जिसे स्टॉक मार्केट कहते है, वहा खरीदने और बेचने के लिए उपलब्ध हो जाता है,

दोस्तों,
I Hope, कंपनी द्वारा आईपीओ लाने के लिए किये जाने वाले PROCESS को आप समझ पाए होंगे.
अगर आर्टिकल अच्छा लगा तो इसे नीचे अपना कमेन्ट करना न भूले,
दोस्तों,आज बस इतना ही, अब मिलते है अगले आर्टिकल में,

COMPANY FORMATION से IPO तक का सफ़र-3


IPO- INITIAL PUBLIC OFFERING

दोस्तो,
आज का हमारा Topic है,  IPO – Initial Public Offering और आज के इस टॉपिक में हम जानेंगे –
IPO – Initial Public Offering क्या है ?
IPO – Initial Public Offering की जरुरत क्यों है?
IPO – Initial Public Offering से क्या क्या फायदे है? और साथ ही जानेंगे -IPO – Initial Public Offering का क्या PROCESS है?
अगर आपके मन मे भी IPO – Initial Public Offering से सम्बंधित कुछ इस तरह के सवाल है, तो आप इस ARTICLE को पूरा पढ़ते रहिये,
क्योंकि मैं आज आपसे इसी के बारे में बात करने वाला हु,

IPO – INITIAL PUBLIC OFFERING क्या है?

IPO का फुल फॉर्म है – Initial Public Offering
और Initial Public Offering का हिंदी अर्थ है – प्रारंभिक सार्वजनिक प्रस्ताव,
जब कोई कंपनी, अपनी पूंजी की आवश्यकता के लिए ये निर्णय लेती है, कि वह अपनी कम्पनी का Share आम जनता को बेचकर, अपनी पूंजी की आवश्यकता को पूरी करेंगी,
तो इसके लिए उस कम्पनी को अपना शेयर लोगो को बेचने के लिए SEBI द्वारा बनाये गए नियम और शर्तो को पूरा करते हुए, आम जनता के सामने शेयर बेचने के प्रस्ताव (PROSPECTUS) को लाना होता है, इसी प्रस्ताव को IPO यानी Initial Public Offering या PUBLIC ISSUE कहा जाता है,
आईपीओ को आप आसान भाषा में इस तरीके से भी समझ सकते है –
किसी कंपनी द्वारा पहली बार PUBLIC को शेयर खरीदने के  ऑफर को IPO कहते है”
“IPO के द्वारा एक Public Limited कंपनी FUND आम जनता से FUND इकठ्ठा करती है,”
“IPO वह PROCESS है, जिसके द्वारा एक Public Limited Company अपने आपको पहली बार स्टॉक मार्केट पर लिस्ट करती है”
“IPO एक PROCESS है, जिसके द्वारा कंपनी अपनी जरुरत के मुताबिक, अतिरिक्त पूंजी की आवश्यकता के लिएआम जनता को, अपनी कंपनी में शेयर देने के बदले, पूंजी के रुपे पैसे मांगने, का प्रस्ताव रखती है,”
“IPO एक PRIMARY MARKET के द्वारा की सीधे कंपनी द्वारा की जाने वाली शेयर की विक्री का PROCESS है”
“IPO के माध्यम से हम DIRECT COMPANY से शेयर खरीदने का आवेदन करते है, और आवेदन स्वीकृत हो जाने पर हम सीधे कंपनी से हमारे DEMAT ACCOUNT में शेयर क्रेडिट हो जाते है”

IPO – INITIAL PUBLIC OFFERING की जरुरत क्यों है?

आइये अब बात करते है IPO की जरुरत क्यों है ?
जब कोई कंपनी अपने BUSINESS को बड़े पैमाने पर बढ़ाना चाहती है, तो उसे बहुत बड़ी मात्रा में पूंजी की आवश्यकता होती है, और ऐसे में कंपनी के पास पूंजी को प्राप्त करने के लिए अलग अलग कई सोर्स हो सकते है, जैसे –
  1. कंपनी अपने पास उपलब्ध सोर्सेज से, (By Internal Sources of company)
  2. Private Equity Sources,
  3. बैंक से Loan लेकर,
  4. बांड(BOND) या ऋण पत्र (Debenture) के माध्यम से,
  5. IPO के माध्यम से अपने अपने AUTHORIZED CAPITAL को शेयर में PUBLIC को ALLOT करके,
इस तरह कंपनी के पास कई अन्य सोर्स भी हो सकते है, जहा से वो अपने पूंजी की आवश्यकता को पूरा करने के लिए FUND इकठ्ठा कर सकती है,
लेकिन IPO को छोड़ बाकी सभी SOURCES से मिलने वाला FUND कंपनी के ऊपर एक LOAN की तरह होता है, जिस पर उसे REGULAR व्याज देने के साथ पूंजी की वापसी का भी दबाव रहता है,
जबकि IPO द्वारा कंपनी अपने शेयर्स बेच कर लोगो से FUND प्राप्त करने पर कंपनी को किसी तरह का व्याज नहीं देना होता है, और न ही शेयर से मिलने FUND को वापस करने का दबाव होता है, और दूसरा कंपनी अपनी आवश्यकतानुसार जितने FUND चाहिए, वो EQUITY CAPITAL यानी शेयर बेच कर प्राप्त कर सकती है,
इसीलिए कम्पनी अपनी बड़ी से बड़ी पूंजी की आवश्यकता के लिए IPO लाना पसंद करती है, हालाँकि ध्यान रखने वाली बात ये है कि IPO लाने के लिए कंपनी को SEBI द्वारा बनाये गए सभी नियम और शर्तो को पूरा करना होता है,

IPO – INITIAL PUBLIC OFFERING से क्या क्या फायदे है?

अब जहा तक IPO से होने वाले फायदे की बात है तो, IPO लाने से कंपनी को सबसे बड़ा फायदा ये होता है, कि कंपनी को प्राथमिक बाजार से अपनी आवश्यकतानुसार SHARE CAPITAL प्राप्त हो जाता है, और वो बिना किसी व्याज और FUND RETURN करने के दबाव से FREE होकर, अपना BUSINESS कर सकती है,
और IPO से शेयर खरीदने वाले लोगो को फायदा ये होता है, कि आईपीओ के माध्यम से PUBLIC यानी एक निवेशक एक निश्चित PRICE RANGE में उस कम्पनी का शेयर खरीद सकता है, और उस कंपनी का शेयरधारक (शेयरहोल्डर) बन सकता है, और FUTURE में उस कंपनी के शेयर मूल्य में वृद्धि होने पर, उस शेयर्स को स्टॉक मार्केट के माध्यम से किसी और को बेच सकता है,

IPO – INITIAL PUBLIC OFFERING का क्या PROCESS है?


IPO के कम्पलीट PROCESS को हम अगले आर्टिकल में समझेंगे, आप इस लिंक पर क्लिक करके अगला अर्तिक्ल पढ़ सकते है – Initial Public Offering का क्या PROCESS है?
लिंक – IPO PROCESS की पूरी जानकारी 

IPO – INITIAL PUBLIC OFFERING – SUMMARY

अगर हम अपनी बात को SUMMARIZE करे तो, IPO – Initial Public Offering वह PROCESS है, जिसके द्वारा कंपनी, स्टॉक मार्केट में लिस्टेड होती है, और IPO के माध्यम से लोगो से अपने बिज़नस को बढाने के लिए, पूंजी की जरूरत को, अपनी कम्पनी के शेयर के बदले पैसे मांगने का प्रस्ताव लाती है,
दोस्तों,
आशा करता हु, कि आप समझ पाए, IPO – Initial Public Offering क्या है ?IPO – Initial Public Offering की जरुरत क्यों है?IPO – Initial Public Offering से क्या क्या फायदे है?