"i सम्यक" बद्दल थोडक्यात

सम्यक समाजासाठी ६ बिंदूचा संस्कार - स्व अध्ययन - सामुहीकता - समत्व - सेवा - स्वातंत्र्य - संघर्ष.या ६ बिंदूचा संस्काराशी संबधित सर्व क्षेत्रां(अर्थशास्त्र, सेवाकार्य, विचार दर्शन, इतिहास व इतर) वर वाचन-लेखन -चर्चा-कार्यशाळा-सेवा-अनुभव या साठी "i सम्यक"
Our aim is to provide Education to people for social reform. Our thinking is Self Study - Togetherness - Equality - Self less Service - Freedom - Fight for right is the 6 point for Rite of society.

कृष्णभक्त रसखान


रसखान का जन्म सन् 1548 में हुआ माना जाता है। उनका मूल नाम सैयद इब्राहिम था और वे दिल्ली के आस-पास के रहने वाले थे। कृष्ण-भक्ति ने उन्हें ऐसा मुग्ध कर दिया कि गोस्वामी विट्ठलनाथ से दीक्षा ली और ब्रजभूमि में जा बसे। सन् 1628 के लगभग उनकी मृत्यु हुई।
सुजान रसखान और प्रेमवाटिका उनकी उपलब्ध कृतियाँ हैं। रसखान रचनावली के नाम से उनकी रचनाओं का संग्रह मिलता है।
प्रमुख कृष्णभक्त कवि रसखान की अनुरक्ति न केवल कृष्ण के प्रति प्रकट हुई है बल्कि कृष्ण-भूमि के प्रति भी उनका अनन्य अनुराग व्यक्त हुआ है। उनके काव्य में कृष्ण की रूप-माधुरी, ब्रज-महिमा, राधा-कृष्ण की प्रेम-लीलाओं का मनोहर वर्णन मिलता है। वे अपनी प्रेम की तन्मयता, भाव-विह्नलता और आसक्ति के उल्लास के लिए जितने प्रसिद्ध हैं उतने ही अपनी भाषा की मार्मिकता, शब्द-चयन तथा व्यंजक शैली के लिए। उनके यहाँ ब्रजभाषा का अत्यंत सरस और मनोरम प्रयोग मिलता है, जिसमें ज़रा भी शब्दाडंबर नहीं है।

रसखान के दोहे 
प्रेम प्रेम सब कोउ कहत, प्रेम न जानत कोइ।

जो जन जानै प्रेम तो, मरै जगत क्यों रोइ॥
कमल तंतु सो छीन अरु, कठिन खड़ग की धार।

अति सूधो टढ़ौ बहुरि, प्रेमपंथ अनिवार॥
बिन गुन जोबन रूप धन, बिन स्वारथ हित जानि।

सुद्ध कामना ते रहित, प्रेम सकल रसखानि॥
प्रेम अगम अनुपम अमित, सागर सरिस बखान।

जो आवत एहि ढिग बहुरि, जात नाहिं रसखान॥
अति सूक्ष्म कोमल अतिहि, अति पतरौ अति दूर।

प्रेम कठिन सब ते सदा, नित इकरस भरपूर॥
भले वृथा करि पचि मरौ, ज्ञान गरूर बढ़ाय।

बिना प्रेम फीको सबै, कोटिन कियो उपाय॥
दंपति सुख अरु विषय रस, पूजा निष्ठा ध्यान।

इन हे परे बखानिये, सुद्ध प्रेम रसखान॥
प्रेम रूप दर्पण अहे, रचै अजूबो खेल।

या में अपनो रूप कछु, लखि परिहै अनमेल॥
हरि के सब आधीन पै, हरी प्रेम आधीन।

याही ते हरि आपु ही, याहि बड़प्पन दीन॥

उपन्यास सम्राट मुन्शी प्रेमचंद



जन्म
प्रेमचन्द का जन्म ३१ जुलाई सन् १८८० को बनारस शहर से चार मील दूर लमही गाँव में हुआ था। आपके पिता का नाम अजायब राय था। वह डाकखाने में मामूली नौकर के तौर पर काम करते थे।
जीवन
धनपतराय की उम्र जब केवल आठ साल की थी तो माता के स्वर्गवास हो जाने के बाद से अपने जीवन के अन्त तक लगातार विषम परिस्थितियों का सामना धनपतराय को करना पड़ा। पिताजी ने दूसरी शादी कर ली जिसके कारण बालक प्रेम व स्नेह को चाहते हुए भी ना पा सका। आपका जीवन गरीबी में ही पला। कहा जाता है कि आपके घर में भयंकर गरीबी थी। पहनने के लिए कपड़े न होते थे और न ही खाने के लिए पर्याप्त भोजन मिलता था। इन सबके अलावा घर में सौतेली माँ का व्यवहार भी हालत को खस्ता करने वाला था।
शादी
आपके पिता ने केवल १५ साल की आयू में आपका विवाह करा दिया। पत्नी उम्र में आपसे बड़ी और बदसूरत थी। पत्नी की सूरत और उसके जबान ने आपके जले पर नमक का काम किया। आप स्वयं लिखते हैं, "उम्र में वह मुझसे ज्यादा थी। जब मैंने उसकी सूरत देखी तो मेरा खून सूख गया।......." उसके साथ - साथ जबान की भी मीठी न थी। आपने अपनी शादी के फैसले पर पिता के बारे में लिखा है "पिताजी ने जीवन के अन्तिम सालों में एक ठोकर खाई और स्वयं तो गिरे ही, साथ में मुझे भी डुबो दिया: मेरी शादी बिना सोंचे समझे कर डाली।" हालांकि आपके पिताजी को भी बाद में इसका एहसास हुआ और काफी अफसोस किया।
विवाह के एक साल बाद ही पिताजी का देहान्त हो गया। अचानक आपके सिर पर पूरे घर का बोझ आ गया। एक साथ पाँच लोगों का खर्चा सहन करना पड़ा। पाँच लोगों में विमाता, उसके दो बच्चे पत्नी और स्वयं। प्रेमचन्द की आर्थिक विपत्तियों का अनुमान इस घटना से लगाया जा सकता है कि पैसे के अभाव में उन्हें अपना कोट बेचना पड़ा और पुस्तकें बेचनी पड़ी। एक दिन ऐसी हालत हो गई कि वे अपनी सारी पुस्तकों को लेकर एक बुकसेलर के पास पहुंच गए। वहाँ एक हेडमास्टर मिले जिन्होंने आपको अपने स्कूल में अध्यापक पद पर नियुक्त किया।
शिक्षा
अपनी गरीबी से लड़ते हुए प्रेमचन्द ने अपनी पढ़ाई मैट्रिक तक पहुंचाई। जीवन के आरंभ में आप अपने गाँव से दूर बनारस पढ़ने के लिए नंगे पाँव जाया करते थे। इसी बीच पिता का देहान्त हो गया। पढ़ने का शौक था, आगे चलकर वकील बनना चाहते थे। मगर गरीबी ने तोड़ दिया। स्कूल आने - जाने के झंझट से बचने के लिए एक वकील साहब के यहाँ ट्यूशन पकड़ लिया और उसी के घर एक कमरा लेकर रहने लगे। ट्यूशन का पाँच रुपया मिलता था। पाँच रुपये में से तीन रुपये घर वालों को और दो रुपये से अपनी जिन्दगी की गाड़ी को आगे बढ़ाते रहे। इस दो रुपये से क्या होता महीना भर तंगी और अभाव का जीवन बिताते थे। इन्हीं जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों में मैट्रिक पास किया।
साहित्यिक रुचि
गरीबी, अभाव, शोषण तथा उत्पीड़न जैसी जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियाँ भी प्रेमचन्द के साहित्य की ओर उनके झुकाव को रोक न सकी। प्रेमचन्द जब मिडिल में थे तभी से आपने उपन्यास पढ़ना आरंभ कर दिया था। आपको बचपन से ही उर्दू आती थी। आप पर नॉवल और उर्दू उपन्यास का ऐसा उन्माद छाया कि आप बुकसेलर की दुकान पर बैठकर ही सब नॉवल पढ़ गए। आपने दो - तीन साल के अन्दर ही सैकड़ों नॉवेलों को पढ़ डाला।
आपने बचपन में ही उर्दू के समकालीन उपन्यासकार सरुर मोलमा शार, रतन नाथ सरशार आदि के दीवाने हो गये कि जहाँ भी इनकी किताब मिलती उसे पढ़ने का हर संभव प्रयास करते थे। आपकी रुचि इस बात से साफ झलकती है कि एक किताब को पढ़ने के लिए आपने एक तम्बाकू वाले से दोस्ती करली और उसकी दुकान पर मौजूद "तिलस्मे - होशरुबा" पढ़ डाली।
अंग्रेजी के अपने जमाने के मशहूर उपन्यासकार रोनाल्ड की किताबों के उर्दू तरजुमो को आपने काफी कम उम्र में ही पढ़ लिया था। इतनी बड़ी - बड़ी किताबों और उपन्यासकारों को पढ़ने के बावजूद प्रेमचन्द ने अपने मार्ग को अपने व्यक्तिगत विषम जीवन अनुभव तक ही महदूद रखा।
तेरह वर्ष की उम्र में से ही प्रेमचन्द ने लिखना आरंभ कर दिया था। शुरु में आपने कुछ नाटक लिखे फिर बाद में उर्दू में उपन्यास लिखना आरंभ किया। इस तरह आपका साहित्यिक सफर शुरु हुआ जो मरते दम तक साथ - साथ रहा।


प्रेमचन्द की दूसरी शादी

सन् १९०५ में आपकी पहली पत्नी पारिवारिक कटुताओं के कारण घर छोड़कर मायके चली गई फिर वह कभी नहीं आई। विच्छेद के बावजूद कुछ सालों तक वह अपनी पहली पत्नी को खर्चा भेजते रहे। सन् १९०५ के अन्तिम दिनों में आपने शीवरानी देवी से शादी कर ली। शीवरानी देवी एक विधवा थी और विधवा के प्रति आप सदा स्नेह के पात्र रहे थे।
यह कहा जा सकता है कि दूसरी शादी के पश्चात् आपके जीवन में परिस्थितियां कुछ बदली और आय की आर्थिक तंगी कम हुई। आपके लेखन में अधिक सजगता आई। आपकी पदोन्नति हुई तथा आप स्कूलों के डिप्टी इन्सपेक्टर बना दिये गए। इसी खुशहाली के जमाने में आपकी पाँच कहानियों का संग्रह सोजे वतन प्रकाश में आया। यह संग्रह काफी मशहूर हुआ।
व्यक्तित्व
सादा एवं सरल जीवन के मालिक प्रेमचन्द सदा मस्त रहते थे। उनके जीवन में विषमताओं और कटुताओं से वह लगातार खेलते रहे। इस खेल को उन्होंने बाजी मान लिया जिसको हमेशा जीतना चाहते थे। अपने जीवन की परेशानियों को लेकर उन्होंने एक बार मुंशी दयानारायण निगम को एक पत्र में लिखा "हमारा काम तो केवल खेलना है- खूब दिल लगाकर खेलना- खूब जी- तोड़ खेलना, अपने को हार से इस तरह बचाना मानों हम दोनों लोकों की संपत्ति खो बैठेंगे। किन्तु हारने के पश्चात् - पटखनी खाने के बाद, धूल झाड़ खड़े हो जाना चाहिए और फिर ताल ठोंक कर विरोधी से कहना चाहिए कि एक बार फिर जैसा कि सूरदास कह गए हैं, "तुम जीते हम हारे। पर फिर लड़ेंगे।" कहा जाता है कि प्रेमचन्द हंसोड़ प्रकृति के मालिक थे। विषमताओं भरे जीवन में हंसोड़ होना एक बहादुर का काम है। इससे इस बात को भी समझा जा सकता है कि वह अपूर्व जीवनी-शक्ति का द्योतक थे। सरलता, सौजन्यता और उदारता के वह मूर्ति थे।
जहां उनके हृदय में मित्रों के लिए उदार भाव था वहीं उनके हृदय में गरीबों एवं पीड़ितों के लिए सहानुभूति का अथाह सागर था। जैसा कि उनकी पत्नी कहती हैं "कि जाड़े के दिनों में चालीस - चालीस रुपये दो बार दिए गए दोनों बार उन्होंने वह रुपये प्रेस के मजदूरों को दे दिये। मेरे नाराज होने पर उन्होंने कहा कि यह कहां का इंसाफ है कि हमारे प्रेस में काम करने वाले मजदूर भूखे हों और हम गरम सूट पहनें।"
प्रेमचन्द उच्चकोटि के मानव थे। आपको गाँव जीवन से अच्छा प्रेम था। वह सदा साधारण गंवई लिबास में रहते थे। जीवन का अधिकांश भाग उन्होंने गाँव में ही गुजारा। बाहर से बिल्कुल साधारण दिखने वाले प्रेमचन्द अन्दर से जीवनी-शक्ति के मालिक थे। अन्दर से जरा सा भी किसी ने देखा तो उसे प्रभावित होना ही था। वह आडम्बर एवं दिखावा से मीलों दूर रहते थे। जीवन में न तो उनको विलास मिला और न ही उनको इसकी तमन्ना थी। तमाम महापुरुषों की तरह अपना काम स्वयं करना पसंद करते थे।


ईश्वर के प्रति आस्था

जीवन के प्रति उनकी अगाढ़ आस्था थी लेकिन जीवन की विषमताओं के कारण वह कभी भी ईश्वर के बारे में आस्थावादी नहीं बन सके। धीरे - धीरे वे अनीश्वरवादी से बन गए थे। एक बार उन्होंने जैनेन्दजी को लिखा "तुम आस्तिकता की ओर बढ़े जा रहे हो - जा रहीं रहे पक्के भग्त बनते जा रहे हो। मैं संदेह से पक्का नास्तिक बनता जा रहा हूँ।"
मृत्यू के कुछ घंटे पहले भी उन्होंने जैनेन्द्रजी से कहा था - "जैनेन्द्र, लोग ऐसे समय में ईश्वर को याद करते हैं मुझे भी याद दिलाई जाती है। पर मुझे अभी तक ईश्वर को कष्ट देने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई।"
प्रेमचन्द की कृतियाँ
प्रेमचन्द ने अपने नाते के मामू के एक विशेष प्रसंग को लेकर अपनी सबसे पहली रचना लिखी। १३ साल की आयु में इस रचना के पूरा होते ही प्रेमचन्द साकहत्यकार की पंक्ति में खड़े हो गए। सन् १८९४ ई० में "होनहार बिरवार के चिकने-चिकने पात" नामक नाटक की रचना की। सन् १८९८ में एक उपन्यास लिखा। लगभग इसी समय "रुठी रानी" नामक दूसरा उपन्यास जिसका विषय इतिहास था की रचना की। सन १९०२ में प्रेमा और सन् १९०४-०५ में "हम खुर्मा व हम सवाब" नामक उपन्यास लिखे गए। इन उपन्यासों में विधवा-जीवन और विधवा-समस्या का चित्रण प्रेमचन्द ने काफी अच्छे ढंग से किया।
जब कुछ आर्थिक निर्जिंश्चतता आई तो १९०७ में पाँच कहानियों का संग्रह सोड़ो वतन (वतन का दुख दर्द) की रचना की। जैसा कि इसके नाम से ही मालूम होता है, इसमें देश प्रेम और देश को जनता के दर्द को रचनाकार ने प्रस्तुत किया। अंग्रेज शासकों को इस संग्रह से बगावत की झलक मालूम हुई। इस समय प्रेमचन्द नायाबराय के नाम से लिखा करते थे। लिहाजा नायाब राय की खोज शुरु हुई। नायाबराय पकड़ लिये गए और शासक के सामने बुलाया गया। उस दिन आपके सामने ही आपकी इस कृति को अंग्रेजी शासकों ने जला दिया और बिना आज्ञा न लिखने का बंधन लगा दिया गया।
इस बंधन से बचने के लिए प्रेमचन्द ने दयानारायण निगम को पत्र लिखा और उनको बताया कि वह अब कभी नयाबराय या धनपतराय के नाम से नहीं लिखेंगे तो मुंशी दयानारायण निगम ने पहली बार प्रेमचन्द नाम सुझाया। यहीं से धनपतराय हमेशा के लिए प्रेमचन्द हो गये।
"सेवा सदन", "मिल मजदूर" तथा १९३५ में गोदान की रचना की। गोदान आपकी समस्त रचनाओं में सबसे ज्यादा मशहूर हुई अपनी जिन्दगी के आखिरी सफर में मंगलसूत्र नामक अंतिम उपन्यास लिखना आरंभ किया। दुर्भाग्यवश मंगलसूत्र को अधूरा ही छोड़ गये। इससे पहले उन्होंने महाजनी और पूँजीवादी युग प्रवृत्ति की निन्दा करते हुए "महाजनी सभ्यता" नाम से एक लेख भी लिखा था।


मृत्यु

सन् १९३६ ई० में प्रेमचन्द बीमार रहने लगे। अपने इस बीमार काल में ही आपने "प्रगतिशील लेखक संघ" की स्थापना में सहयोग दिया। आर्थिक कष्टों तथा इलाज ठीक से न कराये जाने के कारण ८ अक्टूबर १९३६ में आपका देहान्त हो गया। और इस तरह वह दीप सदा के लिए बुझ गया जिसने अपनी जीवन की बत्ती को कण-कण जलाकर भारतीयों का पथ आलोकित किया।
प्रेमचंद की सर्वोत्तम 15 कहानियां
मुंशी प्रेमचंद को उनके समकालीन पत्रकार बनारसीदास चतुर्वेदी ने 1930 में उनकी प्रिय रचनाओं के बारे में प्रश्न किया, "आपकी सर्वोत्तम पन्द्रह गल्पें कौनसी हैं?"
प्रेमचंद ने उत्तर दिया, "इस प्रश्न का जवाब देना कठिन है। 200 से ऊपर गल्पों में कहाँ से चुनूँ, लेकिन स्मृति से काम लेकर लिखता हूँ -
  1. बड़े घर की बेटी
  2. रानी सारन्धा
  3. नमक का दरोगा
  4. सौत
  5. आभूषण
  6. प्रायश्चित
  7. कामना
  8. मन्दिर और मसजिद
  9. घासवाली
  10. महातीर्थ
  11. सत्याग्रह
  12. लांछन
  13. सती
  14. लैला
  15. मन्त्र"

संतो जागत नींद न कीजै।।





संतो जागत नींद न कीजै।।

काल न खाय कलप नहिं व्यापै। देह जुरा नहिं छीजै।।

उलटी गंग समुद्रहिं सोखै। ससि अउ सूरहिं ग्रासै।।
नव ग्रह मारि रोगिया बैठे। जल में बिंबु प्रगासै।।

बिनु चरनन को दहुँ दिसि धावै। बिनु लोचन जग सूझै ।।
ससा उलटि सिंह को ग्रासै। ई अचरज कोई बूझै ।।

अउंधे घडा नहीं जल बूड़े। सूधे सो जल भरिया।।
जेहि कारण नर भिन्न&भिन्न करै। सो गुरु परसावे तरिया।।

बैठि गुफा में सभजग देखै। बाहर किछउ न सूझै ।।
उलटा बान पारधिहीं लागै। सूरा होय सो बूझै ।। 

गायन कहैं कबहुं नहिं गावै। अनबोला नित गावै।।
नटवट बाजा पेखनि पेखै। अनहद हेत बढ़ावै।।

कथनी बदनी निजुकै जीवै। ई सम अकथ कहानी।
धरती उलटि अकासहिं बघे। ई पुर्खन की बानी।।

बिना पिआला अमृत अंचवै।नदी नीर भरि राखै।
कहैं कबीर सो जुग&जुग जीवै। जो राम सुधा रस चाखै।।

सम्यक म्हणजे काय..?


सम्यक म्हणजे काय ...?

सोशल मेडिया वरील अनेक ग्रुप आणि आपल्या बुद्ध साहित्यात सम्यक हां शब्द आवर्जून येतो 
सम्यक चा अर्थ गौतम बुद्धांना जसा अपेक्षित आहे तो समजून घेण्यासाठी  बुद्धानीं संगीतलेले काही उपदेश परखावे लागतील.
बुद्धानी चार आर्य सत्य सांगितले आहेत 
1)
दुःख
2)
दुःखाचे कारण 
3)
दुःख निवारण 
4)
आणि दुःख निवण्याचा मार्ग

1)
दुःख :- हे बुद्धानी सांगितलेले पाहिले आर्य सत्य आहे .सर्व जगात दुःख आहे.दुःखा शिवाय सुखाची किंमत कळाली नसती.माणव जन्म वेळी जेव्हा आईच्या पोटातून बाहेर येतो तेव्हा पहले दुःखची जाणीव होत असावी कारण 9 महीने आईच्या पोटात एकरूप झलेलाल तो भ्रूण जेव्हा बाहेर भूतलाववर येतो तेव्हा त्याला असह्य अस्या वेदना होत असाव्या म्हणून तो रडत येतो.तसेच मरते समयी माणसाला खुप दुःख होते तो त्याने जे आयुष भर कमवलेले असते ते सर्व सोडून तो जात आहे याचे दुःख .जन्म आणि मृत्यु त्यांच्या मधील जो काल असतो त्यात ही अनेक दुःख असतात.सर्व प्रथम माणसाने एवढे लक्षात घ्यावे की या जगात दुःख आहे.

2)
दुःखाचे कारण
माणसाला होणाऱ्या दुःखा चे कारण काय..?
आता आपण असे समजतो की दुःख हे मानवनिर्मित आहे किंवा भावना प्रगट करन यातून तैयार झालेली भावना मंजे दुःख होय.पण बुद्ध सांगतात .हे दोन्ही ही गोष्टी चूक आहेत.दुःख हे कार्यकारणनियमाने उत्पन्न झाले आहे. तुम्हाला लोभ ,माया ,हाव,तृष्णा ,कामतुष्णा आहे तर दुःख आहे ,जर तुष्णा च नाही तर दुःख च नाही मंजे दुःखाचे मूळ कारण मंजे हाव
3)
दुःख निवारन :- या सर्व गोष्टी मूळ दुःख होते त्याचा नाश कसा करावा ,त्या दुःख चे निवारण कसे करावे.बुद्ध सांगता दुःखाचे कारण हाव आहे तुष्णा आहे मंजे या दोन गोष्टीचा नाश झाला मंजे दुःखचा सुद्धा नाश होणार, दुसरा कुठला ही पर्याय तुम्ही अवलंबला तरी दुःख नहिशे होणार नाही ,दुःख निरतंर सदा या जगात राहेल .किंवा काहि वाइट गोष्टी संपवल्या किंवा तुम्ही सुद्ध मेले तरी या जगातून दुःख संपणार नाही .

4)
दुःख निवारण्याचा मार्ग
हाव आणि तृष्णा यांचा नाश केला मंजे दुःखा चा नाश होतो हे समजले पण या हाव आणि तुषणेला कही पर्याय आहे का दुसरा कही उपाय आहे की नाही ? जर तुमच्या पायात कटा रुतला असेल त्यामुळे तुम्हाला खुप वेदना होत आहेत त्यामुळे दुःख होत आहे तुम्हाला .यात दुःखाचे कारण कटा आहे आता तो सुरक्षित रीत्य कसा काढ़ावा ,दुःखाचे नाश करायचा म्हणून पायच तोडून टाकायच का ? नाही. मग...
त्या साठी बुद्धानी अष्टांग मार्ग सांगितले आहे तो मंजे सम्यक मार्ग होय.


बुद्धानी आठ मार्ग सांगितले आहे त्याला आपण आष्ठगाथा म्हणतो 
1)
सम्यक द्रुष्टी
2)
सम्यक संकल्प
3)
सम्यक वाचा
4)
सम्यक कार्य
5)
सम्यक आजीव
6)
सम्यक व्यायम
7)
सम्यक स्मुर्ती
8)
सम्यक समाधी
हे आठ मार्ग बुद्धानी सांगितले आहे यात सम्यक हां शब्द प्रत्येक शब्दला ला जोडला आहे ,

सम्यक मंजे " मधला मार्ग".
मजे पर्त्येक गोष्टी चा मधला मार्ग .कुठल्या एखांद्या गोष्टी चा पाहिले टोक आणि शेवट चे टोक या मधील जो मार्ग आहे त्याला सम्यक म्हणतात .
सरळ आणि आजच्या भाषेत सांगायचे झाले तर प्रमाणामधे (लिमिट)
बुद्धानी सांसार केला तिकडे ही त्यांना दुःखा चा अनुभव आला ,नतर त्यांनी खुप दिवस उपासी पोटी तपस्या केली तरि त्यांना काहि बोध झाला नाही, या नंतर बुद्धानी जो परिव्रज्या चा मार्ग अवलम्बला तो सम्यक मार्ग होय
असाच बुद्धाचा सम्यक मार्ग अवलम्बनारे संत तुकाराम महाराज होते ,कही लोक असे म्हणतात संसार करुणी परमार्थ साधला , मंजे त्या काळी देवाचा शोध घेण्या साठी आज काल च्या साधू सारखे मंदिर देवळ जंगल नाही हिंडत बसले .त्यांनी बुद्धाचा सम्यक मार्ग अवलम्बला होता .

नेताजी सुभाष चंद्र बोस


नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा में कटक के एक संपन्न बंगाली परिवार में हुआ था। बोस के पिता का नाम 'जानकीनाथ बोस' और माँ का नाम 'प्रभावती' था। जानकीनाथ बोस कटक शहर के मशहूर वक़ील थे। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल मिलाकर 14 संतानें थी, जिसमें 6 बेटियाँ और 8 बेटे थे। सुभाष चंद्र उनकी नौवीं संतान और पाँचवें बेटे थे। अपने सभी भाइयों में से सुभाष को सबसे अधिक लगाव शरदचंद्र से था।

नेताजी ने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई कटक के रेवेंशॉव कॉलेजिएट स्कूल में हुई। तत्पश्चात् उनकी शिक्षा कलकत्ता के प्रेज़िडेंसी कॉलेज और स्कॉटिश चर्च कॉलेज से हुई, और बाद में भारतीय प्रशासनिक सेवा (इण्डियन सिविल सर्विस) की तैयारी के लिए उनके माता-पिता ने बोस को इंग्लैंड के केंब्रिज विश्वविद्यालय भेज दिया। अँग्रेज़ी शासन काल में भारतीयों के लिए सिविल सर्विस में जाना बहुत कठिन था किंतु उन्होंने सिविल सर्विस की परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया।

1921
में भारत में बढ़ती राजनीतिक गतिविधियों का समाचार पाकर बोस ने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली और शीघ्र भारत लौट आए। सिविल सर्विस छोड़ने के बाद वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड़ गए। सुभाष चंद्र बोस महात्मा गांधी के अहिंसा के विचारों से सहमत नहीं थे। वास्तव में महात्मा गांधी उदार दल का नेतृत्व करते थे, वहीं सुभाष चंद्र बोस जोशीले क्रांतिकारी दल के प्रिय थे। महात्मा गाँधी और सुभाष चंद्र बोस के विचार भिन्न-भिन्न थे लेकिन वे यह अच्छी तरह जानते थे कि महात्मा गाँधी और उनका मक़सद एक है, यानी देश की आज़ादी। सबसे पहले गाँधीजी को राष्ट्रपिता कह कर नेताजी ने ही संबोधित किया था।

1938
में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष निर्वाचित होने के बाद उन्होंने राष्ट्रीय योजना आयोग का गठन किया। यह नीति गाँधीवादी आर्थिक विचारों के अनुकूल नहीं थी। 1939 में बोस पुन एक गाँधीवादी प्रतिद्वंदी को हराकर विजयी हुए। गांधी ने इसे अपनी हार के रुप में लिया। उनके अध्यक्ष चुने जाने पर गांधी जी ने कहा कि बोस की जीत मेरी हार है और ऐसा लगने लगा कि वह कांग्रेस वर्किंग कमिटी से त्यागपत्र दे देंगे। गाँधी जी के विरोध के चलते इस 'विद्रोही अध्यक्ष' ने त्यागपत्र देने की आवश्यकता महसूस की। गांधी के लगातार विरोध को देखते हुए उन्होंने स्वयं कांग्रेस छोड़ दी।

इस बीच दूसरा विश्व युद्ध छिड़ गया। बोस का मानना था कि अंग्रेजों के दुश्मनों से मिलकर आज़ादी हासिल की जा सकती है। उनके विचारों के देखते हुए उन्हें ब्रिटिश सरकार ने कोलकाता में नज़रबंद कर लिया लेकिन वह अपने भतीजे शिशिर कुमार बोस की सहायता से वहां से भाग निकले। वह अफगानिस्तान और सोवियत संघ होते हुए जर्मनी जा पहुंचे।

सक्रिय राजनीति में आने से पहले नेताजी ने पूरी दुनिया का भ्रमण किया। वह 1933 से 36 तक यूरोप में रहे। यूरोप में यह दौर था हिटलर के नाजीवाद और मुसोलिनी के फासीवाद का। नाजीवाद और फासीवाद का निशाना इंग्लैंड था, जिसने पहले विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी पर एकतरफा समझौते थोपे थे। वे उसका बदला इंग्लैंड से लेना चाहते थे। भारत पर भी अँग्रेज़ों का कब्जा था और इंग्लैंड के खिलाफ लड़ाई में नेताजी को हिटलर और मुसोलिनी में भविष्य का मित्र दिखाई पड़ रहा था। दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। उनका मानना था कि स्वतंत्रता हासिल करने के लिए राजनीतिक गतिविधियों के साथ-साथ कूटनीतिक और सैन्य सहयोग की भी जरूरत पड़ती है।

सुभाष चंद्र बोस ने 1937 में अपनी सेक्रेटरी और ऑस्ट्रियन युवती एमिली से शादी की। उन दोनों की एक अनीता नाम की एक बेटी भी हुई जो वर्तमान में जर्मनी में सपरिवार रहती हैं। नेताजी हिटलर से मिले। उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत और देश की आजादी के लिए कई काम किए। उन्होंने 1943 में जर्मनी छोड़ दिया। वहां से वह जापान पहुंचे। जापान से वह सिंगापुर पहुंचे। जहां उन्होंने कैप्टन मोहन सिंह द्वारा स्थापित आज़ाद हिंद फ़ौज की कमान अपने हाथों में ले ली। उस वक्त रास बिहारी बोस आज़ाद हिंद फ़ौज के नेता थे। उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज का पुनर्गठन किया। महिलाओं के लिए रानी झांसी रेजिमेंट का भी गठन किया जिसकी लक्ष्मी सहगल कैप्टन बनी।

'
नेताजी' के नाम से प्रसिद्ध सुभाष चन्द्र ने सशक्त क्रान्ति द्वारा भारत को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से 21 अक्टूबर, 1943 को 'आज़ाद हिन्द सरकार' की स्थापना की तथा 'आज़ाद हिन्द फ़ौज' का गठन किया इस संगठन के प्रतीक चिह्न पर एक झंडे पर दहाड़ते हुए बाघ का चित्र बना होता था। नेताजी अपनी आजाद हिंद फौज के साथ 4 जुलाई 1944 को बर्मा पहुँचे। यहीं पर उन्होंने अपना प्रसिद्ध नारा, "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा" दिया।


18
अगस्त 1945 को टोक्यो (जापान) जाते समय ताइवान के पास नेताजी का एक हवाई दुर्घटना में निधन हुआ बताया जाता है, लेकिन उनका शव नहीं मिल पाया। नेताजी की मौत के कारणों पर आज भी विवाद बना हुआ है।

नुसत्याच वेदनेची होते इथे टवाळी



प्रीती निभावण्याची माझी त-हा निराळी
झाल्या प्रतारणेवर देते हसून टाळी

डोळ्यात डोकवूनी पाहू नका कुणीही
वसते अजून तेथे त्याची छबी गव्हाळी

फेसाळत्या मनाची बेभान लाट होते
ना पोर्णिमा तरीही भरते तिन्ही-त्रिकाळी

'विसरून जायचे' हे ठरण्यात रात्र जाते
हटकून याद येते त्याची पुन्हा सकाळी

याचे असो कि त्याचे, टिकते कुठे निरंतर
काळानुरूप घटते प्रेमातली नव्हाळी

दु:खास मांडताना वेष्टण हवे सुखाचे
नुसत्याच वेदनेची होते इथे टवाळी

-सुप्रिया.

आरोग्याचा बाजार आणि व्यापारी कोलांटीउडी



अनेक वर्षे बदामाचा ढोल पिटल्यानंतर आता हळूच सांगितले जात आहे की, ‘बदाम खा, पण फक्त कॅलिफोर्नियाचे.’ असे काय पोषण या बदामांतून मिळत- जे आपल्याकडच्या बदामांमधून मिळत नाही? बदामांतून मिळणाऱ्या रक्तवर्धक लोहाचे प्रमाण आहे ५.०९ मि. ग्रॅ.! तर आपल्याला सहज उपलब्ध असणाऱ्या तीळांतून त्याहून अधिक म्हणजे ९.३ मि. ग्रॅ. आणि हळिवांमधून तर तब्बल १०० मि. ग्रॅ. लोह मिळते.
बदामाइतकीच अत्यावश्यक मेदाम्ले किलगडाच्या बियांमधून मिळतात. तीळांतून तर ती अधिक संतुलित स्वरूपात मिळतात. शेंगदाण्यांमधून- ३.९० मि. ग्रॅ. आणि तीळांतून तर १२.२० मि. ग्रॅ.! हाडांना पोषक कॅल्शियम बदामांमधून मिळते २३० मि. ग्रॅ., तर तीळांमधून तब्बल १४५० मि. ग्रॅ.! महत्त्वाचं म्हणजे १०० ग्रॅम तीळ दिवसभरातून खाता येतील, पण १०० ग्रॅम बदाम खाणार कसे? आणि खाल्ले तरी पचवणार कसे? तरीही प्रत्येकाने ‘मूठभर बदाम खा!’ असे जाहिरातींमधून सांगितले जाते. मग ते तुम्हाला पचोत वा बाधोत!
अ‍ॅन अ‍ॅपल अ डे कीप्स द डॉक्टर अवे?
हेच सफरचंदाबाबतही! प्रचारामध्ये किवी आणि सफरचंदामधून मिळणाऱ्या ‘क’ जीवनसत्त्वाच्या अलौकिक गुणांचे वर्णन केले जाते; जे बऱ्याच अंशी खरे आहे. मात्र, प्रत्यक्षात या फळांमधून ‘क’ जीवनसत्त्व (Vitamin C) किती मिळते? सफरचंदामधून मिळते केवळ एक मि. ग्रॅ.! परदेशी सफरचंदामधून जरा बरे म्हणजे दहा मि. ग्रॅ.! तर किवीमधून मिळते ६३.९६ मि. ग्रॅ. इतके.
त्या तुलनेत आपल्याला सहज उपलब्ध असणाऱ्या भारतीय फळांमधून कितीतरी अधिक ‘क’ जीवनसत्त्व मिळते. जसे- चिंच १०८ मि. ग्रॅ., काजू फळ १८० मि. ग्रॅ., पेरू २१२ मि. ग्रॅ. आणि आवळा तब्बल ६०० मि. ग्रॅ.! रक्तवर्धक लोह, रक्तवाहिन्या व चेतातंतूंना पोषक मॅग्नेशियम, स्नायूंना (पर्यायाने हृदयस्नायूंना) पोषक पोटॅशिअम, रोगप्रतिकारशक्तिवर्धक आणि प्रजननक्षमतासंवर्धक जस्त वगरे अनेक पोषक घटकांची एतद्देशीय फळांशी तुलना करता किवी व परदेशी सफरचंद भारतीय फळांसमोर उभेसुद्धा राहू शकत नाहीत.
ब्रोकोलीमधून काय मिळते?
ब्रोकोलीमधून आपल्या आरोग्याला उपकारक असे काय मिळते- जे आपल्या भाज्यांमधून मिळत नाही? कोिथबीर (४८०० मायक्रो ग्रॅम), अळू-पान (५९२० मायक्रो ग्रॅम) आणि माठ (८३४० मायक्रो ग्रॅम) यांच्याहून पावपटीपेक्षाही कमी (६२३ मायक्रो ग्रॅम) बीटा-कॅरोटिन ब्रोकोलीमधून मिळते. रक्तनिर्मितीमध्ये आवश्यक फॉलिक अ‍ॅसिड ब्रोकोलीपेक्षा (६३ मायक्रो ग्रॅम) कितीतरी अधिक पालक, माठ व टाकळ्यामधून मिळते.
विविध जीवनसत्त्वे आणि लोह, जस्त आदी खनिजे, प्रथिने आदी सर्वच पोषक घटक पुरविण्यात ब्रोकोली भारतीय भाज्यांपेक्षा बरीच कमजोर आहे. मग लोक का खरेदी करतात ब्रोकोली? ५६ हून अधिक प्रकारच्या पालेभाज्या आणि ४४ हून अधिक प्रकारच्या फूल-फळभाज्या ज्या भारतात पिकतात, तिथल्या लोकांनी परकीय भूमीत उगवणारी, खुडल्यानंतर बर्फात साठवलेली आणि कोणतेही विशेष पोषणमूल्य न देणारी ब्रोकोलीसारखी भाजी का खावी?
भारतीयांना ओट्सची गरजच काय?
ओट्ससारखे अमेरिकेमध्ये घोडे व डुकरांचा खुराक म्हणून वापरले जाणारे धान्य कोलेस्टेरॉल नियंत्रणात ठेवण्यासाठी उपयुक्त म्हणून खाण्याचा सल्ला दिला जातो. पण मुळात जिथे कोलेस्टेरॉलचा रक्तवाहिनी चिंचोळी होण्याशी आणि पर्यायाने हार्ट अटॅकशी संबंध शंकास्पद आहे, तिथे ओट्स का खायचे? ज्या देशात तांदूळ, ज्वारी, बाजरी, नाचणी, गहू, जव पिकतात, त्यांनी आपल्या मातीत न पिकणारे धान्य का म्हणून खायचे? महत्त्वाचे म्हणजे ओट्समधून आपल्याकडील या धान्यांपेक्षा फार पोषक तत्त्वे मिळतात असंही नाही. ओट्सपेक्षा (३६१) अधिक आरोग्यदायी उष्मांक बाजरीतून (३८९) मिळतात. ओट्सहून (११) अधिक चोथा बाजरीमधून (११.३) मिळतो. भारतीयांना अत्यावश्यक असणारी कॅल्शियम, फॉस्फरस, पोटॅशियम, मॅग्नेशियम, लोह आदी तत्त्वे ओट्सहून जास्त बाजरी किंवा नाचणीमधून मिळतात.
तांदळामुळे नव्हे, तर रिफाइण्ड तांदळामुळे भारतीय स्थूल होत आहेत. जे पुरवणारा अन्नपदार्थ म्हणजे आपला वरण-भात. महत्त्वाचे म्हणजे वरण-भात, दाल-रोटी, भाजी-भाकरी, दोसा-सांभार खाताना तुम्ही डाळी, भाज्या, औषधी व पाचक मसाले यांसोबत ते धान्य खाता. आणि तेही संपूर्णत: नसíगक स्वरूपात.
याउलट, ओट्समधून मिळणारे पोषण एकांगी असते. ओट्स आपल्यासमोर येतात तेव्हा तो विविध कृत्रिम प्रक्रिया केलेला एक पदार्थ असतो; ज्यातून साखर, मीठ, प्रिझव्‍‌र्हेटिव्हज्सुद्धा आपल्या पोटात जातात. जे विविध आजारांना आमंत्रण देऊ शकतात. आपण नाचणी, बाजरी अशा देशी धान्यांचे सेवन वाढवले तर त्यांचा खपही वाढेल आणि त्यांचे पीक घेणाऱ्या शेतकऱ्यांच्या आत्महत्या थांबवण्यात आपला थोडा हातभार लागेल. ओट्स खाऊन अमेरिकेची भर करण्यापेक्षा हे कधीही चांगलेच. नाही का?
गुण सांगता.. दोषांचे काय?
याशिवाय अतिशय महत्त्वाचा मुद्दा म्हणजे ओट्स, सीरियल्स, ऑलिव्ह तेल, किवी आदी पदार्थाचे गुण काय आहेत, याचा बराच गवगवा केला जातो. परंतु त्यांचे दोष काय, हे कधीच सांगितले जात नाही. सफरचंदाने होणारा मलावरोध आणि मलावरोधजन्य विकृती, शरीरात वाढणारे शीतत्व व शीतत्वजन्य विकार, किवीच्या आंबटपणामुळे होणारे घशाचे विकार, ओट्समुळे मंदावणारी आतडय़ाची पुर:सरण गती, पचनाचे विकार व मलावरोध, ओट्समधील फायटिक अ‍ॅसिडमुळे आतडय़ांमधून कॅल्शिअम, जस्त व लोहाच्या शोषणामध्ये येणारा अडथळा, ब्रेकफास्ट सीरियल्समुळे स्थूलत्व आणि स्थूलत्वजन्य अनेक विकृतींचा धोका, शरीरात वाढणारा कोरडेपणा व रूक्षत्वजन्य विकृती, बदामामुळे होणारी कठीण मलप्रवृत्ती, ऑलिव्ह तेलामुळे होऊ शकणारे पित्तविकार- या सर्व आरोग्यसंकटांकडे भारतीयांनी काणाडोळा करावा काय?
आपल्या उत्पादनांचे ढोल पिटताना या अन्नपदार्थाचे हे आरोग्यधोके का सांगितले जात नाहीत?
त्याला आर्थिक पलूसुद्धा आहे. २०१५-१६ या वर्षांत परदेशी सफरचंदे खरेदी करण्यासाठी भारताला तब्बल १७५५ कोटी रुपये मोजावे लागले. या वर्षी ऑलिव्ह तेलाची भारताची खरेदी १३,५०० टनांवर जाईल अशी अपेक्षा आहे. ऑलिव्ह तेलाच्या लीटरमागे अगदी वीस टक्के- म्हणजे २०० रुपये फायदा आहे असे गृहीत धरले तरी १३,५०० टन तेल विकले गेल्यास दोन अब्ज सातशे कोटी रु. इतका फायदा विक्रेत्यांना होईल.
आजमितीस भारतीयांना एक कोटी १७ लाख टन खाद्यतेल लागते. त्यातला केवळ ०.१ टक्क्याहून कमी वाटा ऑलिव्ह तेलाचा आहे; जो वाढविण्यासाठी पद्धतशीरपणे प्रयत्न केले जात आहेत. भारतीयांना ज्याची गरज नाही अशा ऑलिव्ह तेलाचा आपल्या खाद्यतेलांच्या सेवनातील हा वाटा जर दहा टक्क्यांवर गेला तर परकीय देशांना त्यातून होणाऱ्या नफ्याचा आकडा किती प्रचंड असेल याची कल्पनाच केलेली बरी.
सकाळचा नाश्ता, रोजच्या जेवणासाठी लागणारे खाद्यतेल, जेवणातील प्रमुख धान्य, भाजी, फळे, सुकामेवा असे सगळेच अन्नपदार्थ जर आपण अमेरिका व युरोपमधून आयात करणार असू, तर त्याचा आपल्या देशाचा आर्थिक ताळेबंद आणि एकंदर आíथक स्थर्यावर काय व किती विपरीत बोजा पडेल याची कल्पनासुद्धा करता येणार नाही. परकीय खाद्यान्नातून देशाचे होणारे हे आíथक नुकसान व भारतीयांच्या आरोग्याला संभवणारे धोके समाजासमोर येणे म्हणूनच अगत्याचे आहे.
आज जग जवळ आले आहे. त्यामुळे वेगवेगळ्या देशांतील अन्नपदार्थाचा चवीमध्ये बदल म्हणून आनंद घेण्यास काहीच हरकत नाही. मात्र, तो आपल्या नित्य सेवनाचा आहार बनला तर आरोग्याची पार वासलात लागेल, हे नक्की. आयुर्वेदानुसार, जो आहार देशसात्म्य आहे- अर्थात निसर्गत: तुमच्या प्रदेशामधील आहे, तोच तुमच्या आरोग्याला अनुकूल आहे. आपल्या गुणसूत्रांना सर्वस्वी परक्या प्रदेशांमध्ये पिकलेले अन्नपदार्थ आपल्या आरोग्याला पूरक होण्याची शक्यता नाहीच; उलट, ते बाधक ठरेल. तसेच विविध आजारांनाही कारणीभूत ठरेल.
आणखीन एक महत्त्वाचा मुद्दा असा की, याच पाश्चात्त्यांनी आपल्या बापजाद्यांना लाल तांदूळ सोडून पांढरा, रिफाइण्ड तांदूळ खायला शिकवले; जे आता पांढरा तांदूळ आरोग्याला कसा घातक आहे, हे पटवून लाल तांदळाचे गुणगान गाऊ लागले आहेत. याच पाश्चात्त्यांनी दातांवर मिठाचे मंजन करणाऱ्या आपल्या पूर्वजांना अडाणी ठरवून टुथपेस्टने दात घासायला शिकवले. आणि आता त्याच टुथपेस्टमध्ये मीठ आहे का, म्हणून विचारताहेत.
यांनीच आपल्या मागच्या दोन पिढय़ांना वनस्पती घी खायला घालून रोगी बनवले आणि नंतर वनस्पती घी कसे घातक आहे, ते सांगू लागले. यांनीच खोबरेल तेलामुळे कोलेस्टेरॉलचा व हार्ट अटॅकचा धोका बळावतो असे सांगितले; आणि आज तेच खोबरेल तेलाचे प्राशन कसे दीर्घायुष्य देते, हे सांगत आहेत. यांनीच गूळ खाल्ल्यामुळे कृमी होतात, असे सांगून भारतीयांना साखरेची चटक लावली; आणि आता साखरेमुळेच अनेक रोग होतात, असे ते म्हणू लागले आहेत. ज्या पाश्चात्त्यांची आहारासंबंधीची मते हरघडी बदलत असतात, त्यांच्या सल्ल्यावर, आहारावर विश्वास ठेवायचा कसा? तोही आयुर्वेदासारखी संपन्न आरोग्य परंपरा व समृद्ध आहार-संस्कृती ज्यांना लाभली आहे त्या देशवासीयांनी?
लेखिका - वैद्य अश्विन सावंत drashwin15@yahoo.com
(पोषणसंदर्भ : नॅशनल इन्स्टिटय़ूट ऑफ न्युट्रिशन, हैदराबाद)

मला काय त्याच...??



चित्तोडची महाराणी पद्मावती हिच्या सौंदर्याची दिगंत किर्ती ऐकून बावचळलेला वासनांध तुर्क अल्लाउद्दीन खिलजी चित्तोडभोवती वेढा टाकून बसला होता. बुलंद दरवाजा, भक्कम तटबंदी असलेल्या लढावू रजपुतांचा चित्तोडगड दाद देत नव्हता. हताश, कामातूर खिलजीला एके दिवशी स्वप्न पडले. महाराणी पद्मावती त्याच्यासमोर उभी होती. अल्लाउद्दीन नखशिखांत शहारला. महाराणी पद्मावतीकडे पुढे पुढे सरकू लागला. क्षणार्धात महाराणी पद्मावतीत महाकाली महादुर्गा संचरली आणि तिने धडावेगळे केलेले अल्लाउद्दीन खिलजीचे शीर तिच्या चरणांवर पडले. या अल्ला, या अल्ला ओरडत अल्लाउद्दीन खिलजी झोपेतून जागा झाला. अंगातून घामाच्या धारा वहात होत्या. पहाटे पडलेल्या स्वप्नाचा मतितार्थ समजून घेऊन एखादा विचारी संस्कारी पुरुष गुमान परत फिरला असता! पण तो अल्लाउद्दीन खिलजी होता! बुलंद दरवाजा तोडून किल्ल्यात घुसायचा व महाराणी पद्मावती हस्तगत करायचा निर्णय करुन तो चित्तोडगडावर चाल करुन गेला. पुढे मागे हजारो तुर्क सैनिक! तुंबळ युध्द झाले. विजयी उन्मादात अल्लाउद्दीन खिलजी बुलंद दरवाजातून आत प्रवेशता झाला आणि त्याचा चेहरा खाडकन उतरला. चिताभस्माचे ढीगच्या ढीग दिसत होते. शूरवीर रजपुत सैनिकांची प्रेतं इतस्ततः विखुरली होती. जिंकलेल्या अल्लाउद्दीन खिलजीचा चेहरा निस्तेज आणि चित्तोडसाठी लढता लढता वीरगतीला प्राप्त झालेल्या रजपुत सैनिकांच्या चेहऱ्यावर दिव्य तेज! रजपुत स्रियांचे नामोनिषाण कुठे दिसत नव्हते. अल्लाउद्दीन खिलजी काय समजायचे ते समजून चुकला. क्रोधाग्नीने त्याचा चेहरा लालेलाल झाला. युध्द जिंकूनही तो हरला होता. गडावरील मठमंदीरं उध्वस्थ करायचा त्याने सुडादेश दिला आणि ...
महाराणी पद्मावतीवर चित्रपट बनवताना असे भव्य दिव्य स्वप्न बॉलीवुडचा महान दिग्दर्शक संजय लीला भन्साळीला का पडले नाही?
चित्तोडभोवती अल्लाउद्दीन खिलजीचा वेढा पडल्यामुळे किल्ल्यातला धान्यसाठा संपत आला होता. बाहेरुन रसद येऊ शकत नव्हती. महाराजा रतनसिंह चिंताग्रस्त झाले होते. कुणीही परपुरुष रजपुत महिलाचे नखही पाहू शकत नाही, या रजपुती परंपरेला चित्तोडगडने मुरड घातली. अल्लाउद्दीन खिलजीने गडावर निरोप पाठवला होता की महाराणी पद्मावतीचे मला आरशात तरी दर्शन घडवा, मी आल्या पावली निघून जाईन! शत्रुलाही दिलेल्या शब्दाला जागणारे रजपुत आणि जन्मदात्या बापाला दिलेला शब्द मोडणारे तुर्क! महाराजा रतनसिंह त्यांच्या धर्माला जागले आणि अल्लाउद्दीन त्याच्या धर्माला जागला. महाराणी पद्मावतीचे आरशातले सौंदर्य बघून अल्लाउद्दीन खिलजी अधिकच चेकाळला. चित्तोडगडचा वेढा त्याने आणखी भक्कम केला.
महाराजा रतनसिंह यांनी मनात ठाम निश्चय करुन राजदरबार भरवला, विचार विनिमय करण्यासाठी! सेनाधिकारी आणि समस्त राजसभा यांच्या नजरा महाराज रतनसिंह यांच्या चेहऱ्यावर खिळल्या होत्या. धीरगंभीर आवाजात महाराज रतनसिंह रावल बोलु लागले. माझ्या प्रिय मेवाड बंधुभगिनींनो, आपण परम भाग्यशाली आहोत. आपल्या प्रिय चित्तोडगडाच्या शाही विवाहाचा मुहूर्त ठरला आहे. आपले आराध्य दैवत महादेव, देवाधिदेव महादेव प्रमुख अतिथी म्हणून उपस्थित राहाणार आहेत. हर हर महादेव! हर हर महादेव! गडाच्या पायथ्याशी तळ ठोकून बसलेल्या अल्लाउद्दीन खिलजी तुर्कालाही शाही खलिता धाडला आहे. चित्तोडगडावर रुधिराभिषेक करावयाचा आहे. महाकालचे शाही स्वागत नरमुंडमालांनी करावयाचे आहे. जोहररुपी रक्तकेसरी गुलाल उधळाववायचा आहे. स्वागतात कुठेही कमतरता राहता कामा नये. रजपुत परंपरेला कुठेही गालबोट लागता कामा नये. बुलंद दरवाजा उघडा. केसरी वस्त्र परिधान करुन महाकालचे भव्य स्वागत करा. त्याच्या स्वागतासाठी महाराणी पद्मावतीसह तमाम सौंदर्यवतींचे चिताभस्म तयार ठेवा. चला, चित्तोडगडाच्या शाही विवाहाच्या तयारीला लागा. ... शूरवीर बादल कुजबुजला. मी सांगत होतो, हे तुर्क मुळीच विश्वासपात्र नाहीत. त्यांना त्यांच्याच भाषेत उत्तर द्यायला हवे होते. पण आता वेळ निघून गेली आहे. आता त्यांना आपण आपल्या सनातन भाषेतच उत्तर देऊ. ... हर हर महादेवच्या गगनभेदी ललकाऱ्यांनी दरबार रोमांचित झाला कारण सर्वोच्च त्याग करायची वेळ आली होती.
हा हा म्हणता ही वार्ता राणीमहालांपर्यंत पोहचली. महाराणी पद्मावतीसह तमाम रजपुत वीरांगनांच्या अंगात वीरश्री संचरली. सनातन भारतीय परंपरेला सर्वाधिक काय प्रिय असेल तर नितीमत्ता आणि त्यासाठी सर्वस्वाचे बलिदान! रजपुत क्षत्राणी आणि त्यांच्यासाठी जोहरकुंड सजू लागले.
महाराजा रतनसिंह यांच्या राज्याभिषेकाच्या वेळी चित्तोडगड जेवढा सजला नव्हता तेवढा आता त्याच्या शाही विवाहाच्या या प्रसंगी सजवला जात होता. प्रचंड उत्साह ओसंडून वहात होता. शत्रूची खांडोळी करता करता वीर मरण! शीलरक्षणार्थ जोहर! क्षत्रीयांच्या आयुष्यातील सर्वोच्च क्षण! रजपुत स्रिया सौभाग्य श्रृंगार करुन आणि रजपुत योध्दा शस्त्रसज्ज होऊन पुढील आदेशाची आतूरतेने प्रतिक्षा करत होते. चंदन, श्रीफळ, तूप, धूप, धीप, गंगाजल, तुलशीदल सारी जय्यत तयारी चालली होती. पुरोहितांनी राजमहालांकडे निरोप पाठवला की पहिले सूर्यकिरण जोहरकुंडावर पडले की जोहर सुरु होईल! पहिला आणि शेवटचा जोहर कुणाचा ते महाराणी पद्मावती ठरवतील. आहुती-राष्ट्रसमर्पण करण्याचा परमोच्च क्षण! ढोल, ताशे, नगारे वाजू लागले तसतसे साऱ्या चित्तोडगडात वीरश्री संचरु लागली. पूर्व क्षितिजावर रक्तिम लालिमा दिसू लागली. सर्व सतींनी आपापल्या पतीदेवांचे अंतिम दर्शन घेतले. तलवारीच्या पात्यांवर सर्रकन अंगठा चिरुन पतीदेवांनी धर्मपत्नींचे कुंकुमतिलक केले. महाराणी पद्मावतीला महाराज रतनसिंह कांही सांगू पहात होते, परंतु महाराणी पद्मावतीच्या चेहऱ्यावरील दिव्य तेज बघून ते गप्प राहिले. आज महाकालच्या पुजेसाठी चिताभस्म तयार करायला निघाली होती राणी पद्मावती! अग्रपुजेचा मान तिचा होता. महाकालात विलीन व्हायला निघाली होती महाकाली पद्मावती!

सूर्यनारायणाचे पहिले किरण जोहरकुंडावर पडले आणि धगधगत्या अग्नीकुंडात, मंत्रघोषात क्षत्रिय रजपुत स्त्रियांच्या समिधा पडू लागल्या. क्षणभर सूर्यदेवही काळवंडला असेल! पावन अग्नीत पावन देहांची आहुती! शीलरक्षणार्थ! सोळा सहस्त्र समिधा! वायुमंडल सुगंधीत झाले. पार्वतीला शिवाची शक्ती म्हणतात! आपापल्या अर्धांगिनींचे शौर्य बघून रजपुत वीरांच्या भुजांमध्ये हजार हत्तींचे बळ आले. बादलच्या वृध्द मातेची शेवटची आहुती पडली आणि जोहरयज्ञ संपन्न झाला.
बुलंद दरवाजा उघडला गेला आणि रजपुत सेना अल्लाउद्दीन खिलजीच्या सैन्यावर तुटून पडली. घनघोर युध्द झाले. एकेका रजपुत वीराने १००-१०० तुर्क कापून काढले तरीही तुर्क शिल्लक राहिलेच! ...
इसवी सन ७११ मध्ये पहिला अरब आक्रमक मोहमद बिन कासिम सिंधवर चाल करुन आला. त्यावेळी भारतात शेकडो क्षत्रिय घराणी होती, त्यांच्या रियासती होत्या परंतु, उर्वरित भारतातील एकही हिंदू राजा सिंधच्या मदतीला धावला नाही. सिंध पराभूत झाले आणि तिथेच अरबांनी हिंदुंना जोखले.
इसवी सन १३०३ पर्यंत अरब मुसलमान भारतात बरेच लांबवर आत घुसले होते. अल्लाउद्दीन खिलजी दिल्लीचा बादशहा होता तेव्हा! त्याने चित्तोडवर स्वारी केली तेव्हाही भारतात अनेक हिंदू रियासती अजून शिल्लक होत्या. परंतु कुणीही चित्तोडच्या मदतीला गेले नाही. मला काय त्याचे? परकीय आक्रमकांविरुध्द ज्याने त्याने लढावे किंवा तडजोडी कराव्या किंवा शरण जावे! मला काय त्याचे? याच निष्क्रियतेमुळे भारत परकीयांच्या गुलामगिरीत गेला. आक्रमक जेते एकटे येत नसतात, त्यांच्या बरोबर त्यांचा धर्मही असतो. त्यामुळे हिंदू आक्रसत गेले आणि भारताच्या भौगोलिक सीमाही आक्रसल्या!
स्वतंत्र भारतात आमची मानसिकता अजून तीच आहे, मला काय त्याचे? म्हणूनच काश्मिरी पंडीत आपल्याच मातृभूमीत निर्वासित जीवन जगत आहेत. भारतातल्या नऊ-दहा प्रांतात हिंदू अल्पसंख्य होण्याच्या मार्गावर आहेत. मला काय त्याचे? बांग्लादेशी घुसखोरांमुळे आसाम-बंगाल प्रांतातील स्थानिक भूमीपुत्र उध्वस्थ होत आहेत. हा त्यांचा प्रश्न आहे, मला काय त्याचे? कोण कुठले रोहिंग्या मुसलमान ब्रह्मदेशातून आले आणि भारतात घुसले. मला काय त्याचे? भारत सरकार बघून घेईल! मोदी सरकार म्हणाले, रोहिंग्यांनों आपण अनाधिकृत घुसखोर आहात. आपल्याला परत जावेच लागेल. तर कित्येक मुल्ला-मौलवी केंद्र सरकारलाच आव्हान देत रोहिंग्यांच्या पाठीशी उभे राहिले! काँग्रेस नेते कपिल सिब्बल, प्रशांत भूषण प्रभूती वकील रोहिंग्यांचा बचाव करण्यासाठी सर्वोच्च न्यायालयात गेले! अभिव्यक्ती स्वातंत्र्याच्या नावाखाली कुणी मकबूल फिदा हुसेन हिंदू देवदेवतांच्या बिभत्स प्रतिमा चितारतो, बॉलीवुडचा कुणी संजय भन्साळी सतत मर्कट लीला करतो. चित्तोडच्या किल्ल्यातच नव्हे तर भारतभर हजारो पद्मावती आक्रोश करत आहेत! मला काय त्याचे? हा रजपुत समाजाचा प्रश्न आहे, मला काय त्याचे? हा पुरोहितांचा प्रश्न आहे, मला काय त्याचे? हा शेतकऱ्यांचा प्रश्न आहे, मला काय त्याचे? हा शिक्षकांचा प्रश्न आहे, मला काय त्याचे? ही माझ्या बापाची समस्या आहे, तो बघून घेईल! मला काय त्याचे? हद्द झाली!मला काय त्याचे?
-अज्ञात

पद्मभूषण वसंतदादा पाटील



महाराष्ट्रातील सहकार क्षेत्राला एक वेगळे, निर्णायक वळण देऊन विकास साधणारे नेते म्हणजे वसंतदादा बंडूजी पाटील होत. क्रांतिकारक, स्वातंत्र्यसैनिक ते विधायक कार्य करणारे, पक्ष संघटना वाढवणारे राजकीय नेते, प्रभावी मुख्यमंत्री व सहकार महर्षी - असा त्यांचा जीवन प्रवास आपल्याला थक्क करतो.
त्यांचे वडील बंडूजी व आई रुक्मिणीबाई यांच्या पोटी जन्मलेल्या वसंतदादांचे शिक्षण जेमतेम सातवीपर्यंत झाले.
सांगली जिल्ह्यातील, तासगाव तालुक्यातील पद्माळे या छोट्या गावी जन्मलेले वसंतदादा १९७७ ते १९८५ या काळात चार वेळा महाराष्ट्राचे मुख्यमंत्री झाले. एकूण सुमारे ४ वर्षे त्यांनी राज्याचे मुख्यमंत्रिपद सांभाळले. ते काही काळ राजस्थानचे राज्यपालही होते. त्या आधी १९७२ मध्ये ते प्रथम मंत्री झाले होते. तसेच स्वतंत्र भारतातल्या पहिल्या निवडणुकीतच ते सांगलीतून आमदार म्हणून निवडून आले होते. पुढील काळात सुमारे २५ वर्षे त्यांनी सांगलीचेच प्रतिनिधित्व (विधानसभेत व लोकसभेत) केले. राजकीय जीवनात त्यांनी महाराष्ट्र राज्य सहकारी बँक, राष्ट्रीय मिल मजदूर संघ, व महाराष्ट्र प्रदेश काँग्रेस आदी संस्था-संघटनांची अध्यक्षपदे सांभाळली. पक्ष कार्याला त्यांनी विशेष महत्त्व दिले. वसंतदादांनंतर काँग्रेस पक्ष संघटनेला एवढे बळ देणारा नेता पुढे काँग्रेसला महाराष्ट्रात मिळालाच नाही. (तसेच प्रामुख्याने ग्रामीण महाराष्ट्रात काँग्रेसचा प्रभाव कायम राहण्यात व वाढण्यात दादांचाच वाटा मोठा आहे,) असे राजकीय निरीक्षक म्हणतात. सत्तेची हाव नसलेला सत्ताधारी, असे दादांबद्दल म्हटले जाते.
महाराष्ट्राचे नेतृत्व करताना दादांनी अनेक समाजहितकारक, दूरगामी परिणाम साधणारे निर्णय घेतले. १९८३ मध्ये त्यांनी वैद्यकीय, अभियांत्रिकी महाविद्यालये व तंत्रनिकेतन विद्यालये विनाअनुदान तत्त्वावर स्थापन करण्याचा निर्णय घेतला. या निर्णयाने शैक्षणिक क्षेत्रात क्रांती घडवली. ग्रामीण भागातील विद्यार्थ्यांना संधी उपलब्ध होण्याबरोबरच, या निर्णयामुळे शैक्षणिक व (पर्यायाने) औद्योगिक विकासालाही चालना मिळाली. वसंतदादांनी राज्याचा विकासविषयक आढावा घेण्यासाठी अर्थतज्ज्ञ वि. म. दांडेकर यांची सत्यशोधन समिती नेमली. यातूनच समतोल विकास, विदर्भ-मराठवाड्याचा अनुशेष (बॅकलॉग) अशा संज्ञा पुढे आल्या. शालेय विद्यार्थ्यांना मोफत एस.टी. प्रवास, परगावी शिक्षण घेणार्‍या विद्यार्थ्यांच्या जेवणाच्या डब्यांची मोफत वाहतूक, शेतकर्‍यांना कमी व्याज दराने कर्जपुरवठा इत्यादी महत्त्वाचे निर्णय दादांनी त्यांच्या काळात घेतले. पाणी अडवा, पाणी जिरवा हे सूत्र प्रथम दादांनी महाराष्ट्रासमोर आणले. दादांच्या या लोकहितकारक निर्णयांची बीजे त्यांच्या देशभक्तीत व त्यांनी केलेल्या क्रांतिकार्यांत आढळतात.
वसंतदादा अगदी लहान वयातही (१९३०) स्वातंत्र्य चळवळीत सामील झाले होते. १९४० पासून त्यांनी लढ्यात जोमाने सहभाग घेतला. फोनच्या तारा तोडणे, पोस्ट जाळणे, रेल्वेचे नुकसान करणे, पिस्तुल-बाँबचा वापर करून ब्रिटिशांमध्ये दहशत निर्माण करणे इत्यादी कामांच्या माध्यमातून त्यांनी सांगली जिल्ह्यात, १९४२ मध्ये आपला ब्रिटिश विरोध प्रखर केला. कायदेभंग चळवळीच्या काळात सोलापूरला चार युवक हुतात्मे झाले. या हौतात्म्याची आठवण म्हणून दादांनी चहा सोडला होता. दादा काही काळ भूमिगत होते. त्यांना सुमारे ३ वर्षे तुरुंगवासही भोगावा लागला. १९४३ मध्ये दादांनी तुरुंगातून निसटण्याचा प्रयत्‍न केला असता, त्यांना खांद्याला गोळी लागली होती, व त्यांना पुन्हा तुरुंगवास भोगावा लागला होता. दादांच्या सुटकेसाठी सांगलीकरांनी सभा-मोर्चा या माध्यमातून प्रयत्न केले होते. या प्रयत्‍नांत रामानंद भारती, बॅ. नाथ पैदेखील सहभागी होते. सातारा-सांगली या भागांत दादा स्वातंत्र्यलढ्यात क्रांतिसिंह नाना पाटील, यशवंतराव चव्हाण यांच्याबरोबर आघाडीवर होते. स्वातंत्र्य मिळाल्यावर स्थानिक स्वातंत्र्य-सैनिकांकडून शस्त्रास्त्रे परत घेऊन, त्यांच्यामध्ये विधायक कार्य करण्याची प्रेरणा निर्माण करण्याचे महत्त्वपूर्ण काम दादांनी केले होते.
वसंतदादांचे महाराष्ट्राच्या उभारणीतील सर्वांत महत्त्वाचे कार्य म्हणजे त्यांनी सहकार क्षेत्राचा केलेला विकास व विस्तार होय. त्यांनी सहकाराच्या माध्यमातून ग्रामीण विकास, कृषी विकास व कृषी-उद्योग विकास साधण्याचा यशस्वी प्रयत्न केला. कुक्कुटपालन, दुग्धविकास या क्षेत्रांत सहकाराचा प्रसार प्रामुख्याने दादांनी केला. खत कारखाने, सूत गिरण्या, तेल गिरण्या, कागद कारखाने, सिमेंट पाईपचे कारखाने, कृषी अवजारांचे उत्पादन व कृषी प्रक्रिया उद्योग इत्यादी उद्योग राज्यात वसंतदादांनी सहकारी तत्त्वावर सुरू केले. १९५६-५७ मध्येच त्यांनी शेतकरी सहकारी साखर कारखान्याची स्थापना केली होती. त्या वेळी त्यांनी स्वत:शेतांमध्ये जाऊन ऊस कसा लावायचा, याचे शेतकर्‍यांना प्रात्यक्षिक दिले होते. सहकारी साखर कारखान्यांनी साखरेसह उप-उत्पादनांचीही निर्मिती करावी असा आग्रह दादांनी धरला. तसेच कारखान्याच्या परिसरात शिक्षण, आरोग्य, इतर उद्योग व मूलभूत सोयीसुविधा या क्षेत्रांत विकास साधण्यासाठी विकास निधी वेगळा काढण्याची कल्पना त्यांनी रुजवली. त्यामुळे आज महाराष्ट्रात कारखान्यांना जोडून निर्माण झालेली विकास केंद्रे आपल्याला दिसतात. दादांनी डेक्कन शुगर इन्स्टिट्यूटची स्थापना करून संशोधनाला चालना दिली. याच संस्थेचे नाव आज वसंतदादा पाटील शुगर इन्स्टिटयूट आहे. आज राज्यात छोट्या-मोठ्या सहकारी पतसंस्थांचे जाळे उभे राहिलेले दिसते. यामध्येही वसंतदादांचा मोठा वाटा आहे.
सहकार क्षेत्रातील या अद्वितीय कामगिरीमुळेच १९६७ मध्ये त्यांना पद्मभूषण या पुरस्काराने गौरवण्यात आले. वसंतदादा १९५२ पासून लोकप्रतिनिधी होते, १९७२ मध्ये ते प्रथम मंत्री झाले, व नंतर मंत्री -मुख्यमंत्री असा त्यांचा राजकीय प्रवास झाला. विशेष म्हणजे १९५२ ते १९७२ दरम्यान त्यांनी सहकार क्षेत्रातील बहुतांश कार्य केले. या पार्श्वभूमीवर दादांनी ज्या काळात सहकार क्षेत्राची पायाभरणी व विस्तार केला तो काळ १९५२ ते १९७२ असल्याचे लक्षात येते. विशेष म्हणजे सत्तास्थानांवर नसताना त्यांनी सहकाराचा प्रचार-प्रसार-विकास केला हे लक्षणीय ठरते.
स्वातंत्र्यपूर्व काळापासूनच्या विविध प्रकारच्या अनुभवांचे संचित, स्मरणशक्ती, नेतृत्वगुण, संघटनकौशल्य, समाजमन-आकलन शक्ती, निर्णयक्षमता, शेतकरी व ग्रामीण समाजजीवनाची अचूक, परिपूर्ण जाणीव - इत्यादी गुणांच्या आधारे वसंतदादांनी महाराष्ट्राचा विकास साधला. १९१८ मध्ये प्लेगच्या साथीत दादांच्या आई-वडिलांचा एकाच दिवशी मृत्यू झाला होता. त्या वेळी केवळ एक वर्षाचे असणार्‍या दादांचा सांभाळ, पुढील आयुष्यात त्यांच्या आजीने केला होता. या परिस्थितीत दादा जास्त शिकू शकले नाहीत. पण पुढील आयुष्यात त्यांनी केलेल्या विकास-कार्याची फळे आज महाराष्ट्र चाखतो आहे. म्हणूनच दुर्दैवाने फार शिकू न शकलेला, पण तरीही सर्वांत शहाणा नेता या समर्पक शब्दांत त्यांचे वर्णन केले जाते.